दिव्या ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से शिव चित्रगुप्त मंदिर सदर बाजार में साप्ताहिक कार्यक्रम में दिव्य गुरु आशुतोष महाराज जी की साध्वी शिष्या एकता भारती ने मनुष्य के जीवन में ब्रह्म ज्ञान का महत्व समझाते हुए कहा कि ब्रह्मज्ञान सनातन युग से ही मनुष्य को देवतुल्य बनाने की वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा हमारी आत्मा को अपनी वास्तविक पहचान और लक्ष्य की प्राप्ति होती हैl
उन्होंने कहा कि हमारी आत्मा को मानव तन की प्राप्ति होना परमात्मा की असीम कृपा का संकेत हैl किंतु आजीवन केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति, परिवार का भरण पोषण और जीवन से मृत्युपर्यंत सभी कर्तव्य को निभाते हुए संसार से चले जाना ही इस मानव जीवन का लक्ष्य है l संत महापुरुष हमें समझाते हुए कहते हैं कि ब्रह्म ज्ञान का संबंध किसी विशेष धर्म संप्रदाय अथवा जाति से नहीं है, क्योंकि इसका आधार आत्म साक्षात्कार मानवीय मन मस्तिष्क को पूर्ण रूप से विकसित करना हैl उन्होंने कहा कि आज हमारे समाज की दुर्दशा का कारण केवल मानवीय मस्तिष्क के नकारात्मकता और उसकी स्वार्थ प्रवृत्ति हैl इसके कारण हम अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए दूसरों का अहित करने में भी संकोच नहीं करते lउन्होंने कहा कि जब हम एक ब्रह्मनिष्ठ संत के ऊर्जा क्षेत्र में प्रवेश करते हैं
ब्रह्मज्ञान की दीक्षा लेकर ध्यान साधना के द्वारा मन को अंतर्मुखी कर अपने अंतःकरण में ही प्रकाश एवं अनहद नाद का अनुभव करते हैं तो मन में सहज रूप से ही सकारात्मक तरंगे प्रभावित होती है lसाध्वी ने कहा कि नशा एवं चरित्रहीनता के कलंक को झेल रही आज की युवा पीढ़ी के लिए ब्रह्मज्ञान एक मृत संजीवनी की तरह कार्य करता है l क्योंकि निरंतर ध्यान साधना के द्वारा हमारे रक्त में सकारात्मक ऊर्जा प्रवाह बढ़ता हैl इससे सोचने समझने की शक्ति विकसित होती है और इंद्रियों पर नियंत्रण सुसाध्य हो जाता है lउन्होंने कहा कि वृद्धावस्था में मनुष्य जितना मृत्यु के निकट जाता है, संसार के प्रति उसकी आसक्ति उतनी तीव्र होती जाती है lएकमात्र ब्रह्मज्ञान ही मृतप्राय हो चुके मानवता को पुनः संजीव कर के एक स्वस्थ समाज का निर्माण करने में बड़ा योगदान दे सकता हैl अंत में साध्वी बहनों ने सुमधुर भजनों का गायन कर संगत को कृतार्थ किया l