दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से शिव चित्र गुप्त मंदिर में साप्ताहिक सत्संग किया गया जिसमें सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की साध्वी शिष्या मुमुक्षा भारती ने श्रद्धा भक्ति की व्याख्या करते हुऐ कहा की श्रद्धा ही भक्ति में दिव्यता एवम पूर्णता की सुगंध को भरती है। क्योंकि श्रद्धा के बिना भक्ति, नीरस और केवल एक दिखावा ही बनकर रह जाती है। हमारे संत महापुरुष कहते हैं की संसार में अधिकतर लोग या तो सांसारिक कामनाओं की इच्छा पूर्ति के लिए भक्ति करते हैं अथवा दुख व संकट से बचने के लिए भक्ति मार्ग को अपनाते हैं।
उन्होंने कहा की श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं की श्रद्धावन मनुष्य ही ज्ञान और भक्ति का अधिकारी है। साध्वी जी ने कहा की श्रद्धा भक्ति के प्राण है एक भक्त के जीवन में श्रद्धा असंभव को भी संभव बना देती है। जैसे भरी सभा में सगे संबंधियों के होते हुऐ भी द्रोपदी की रक्षा केवल उसकी श्रद्धा भक्ति ने ही की। माता शबरी की श्रद्धा ने ही श्री राम को पहली दृष्टि में पहचान लिया । इतिहास में कई भक्तों के उदाहरण आते हैं जब उनके जीवन में कोई भयावह एवम विपरित परिस्थिति आई तो उनकी श्रद्धा ने ही भगवान को उस परिस्थिति से निकालने के लिए निराकार से साकार रूप में प्रकट कर दिया। आज यदि हम केवल अपनी सांसारिक मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु श्रद्धा हीन भक्ति करते हैं तो निश्चित ही हमारी मनोकामनाएं तो पूर्ण हो जाती है किंतु समय के साथ सुख देने वाले साधन भी दुख देने वाले बन जाते हैं अंत में सामूहिक ध्यान साधना एवम सुंदर भावपूर्ण भजनों के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया।