World Mental Health Day: डिजिटल स्ट्रेस बढ़ा रहा मानसिक परेशानी का खतरा, मोबाइल-सोशल मीडिया की ये आदतें बन सकती हैं वजहेंWorld Mental Health Day: डिजिटल स्ट्रेस बढ़ा रहा मानसिक परेशानी का खतरा, मोबाइल-सोशल मीडिया की ये आदतें बन सकती हैं वजहें

क्या आप बिना किसी काम के बार-बार मोबाइल चेक करते हैं? रात में फोन चलाए बिना नींद नहीं आती? सोशल मीडिया देखने के बाद दूसरों की जिंदगी से अपनी तुलना करने लगते हैं? अगर इन सवालों का जवाब हां है, तो इसे सिर्फ आदत समझकर नज़रअंदाज़ न करें। लगातार स्क्रीन और सोशल मीडिया का इस्तेमाल मानसिक थकान और तनाव से जुड़ा हो सकता है।

नई दिल्ली/करनाल। आज के डिजिटल दौर में डिजिटल स्ट्रेस एक ऐसी समस्या बनकर सामने आ रहा है, जिस पर लोगों को समय रहते ध्यान देने की जरूरत है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन मीटिंग, डिजिटल पेमेंट, मनोरंजन और पढ़ाई ने जिंदगी को आसान बनाया है, लेकिन इनके बढ़ते इस्तेमाल के साथ स्क्रीन से जुड़ा मानसिक दबाव भी बढ़ सकता है।

आज शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसकी सुबह मोबाइल देखने से शुरू न होती हो। आंख खुलते ही WhatsApp के मैसेज, सोशल मीडिया नोटिफिकेशन, ई-मेल या न्यूज अपडेट देखना अब रोजमर्रा की आदत बन चुका है। इसके बाद काम, पढ़ाई या मनोरंजन के दौरान भी बार-बार फोन चेक करने की इच्छा बनी रहती है।

समस्या तब शुरू होती है जब मोबाइल का इस्तेमाल जरूरत के बजाय आदत या मजबूरी जैसा महसूस होने लगे। व्यक्ति कुछ मिनट के लिए फोन उठाता है, लेकिन कब आधा या एक घंटा निकल जाता है, इसका पता ही नहीं चलता। सोशल मीडिया पर दूसरे लोगों की तस्वीरें, यात्राएं, उपलब्धियां और बेहतर दिखती जिंदगी देखकर अनजाने में तुलना की भावना भी पैदा हो सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, हर व्यक्ति पर स्क्रीन टाइम का प्रभाव एक जैसा नहीं होता। स्क्रीन पर बिताया गया समय ही पूरी कहानी नहीं बताता। यह भी महत्वपूर्ण है कि व्यक्ति फोन पर क्या कर रहा है, कितनी बार उसका इस्तेमाल कर रहा है और क्या इसकी वजह से उसकी नींद, काम, पढ़ाई, रिश्ते या रोजमर्रा की गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।

डिजिटल स्ट्रेस क्या है?

डिजिटल स्ट्रेस को आसान भाषा में डिजिटल डिवाइस और ऑनलाइन गतिविधियों से जुड़ा मानसिक दबाव कहा जा सकता है। लगातार नोटिफिकेशन, बहुत अधिक जानकारी, सोशल मीडिया की लगातार सक्रियता, ऑनलाइन उपलब्ध रहने का दबाव और स्क्रीन से दूरी न बना पाना इसमें भूमिका निभा सकता है।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को हर कुछ मिनट में फोन देखने की आदत है। मैसेज का जवाब तुरंत न मिलने पर बेचैनी होने लगती है। सोशल मीडिया पर पोस्ट की प्रतिक्रिया कम मिलने से चिंता होती है या दूसरे व्यक्ति की सफलता देखकर अपनी जिंदगी खराब लगने लगती है। ऐसे अनुभव लगातार बने रहें तो मानसिक थकान बढ़ सकती है।

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि केवल ज्यादा मोबाइल इस्तेमाल करने से किसी व्यक्ति को मानसिक बीमारी होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। मानसिक स्वास्थ्य कई सामाजिक, व्यक्तिगत, जैविक और पर्यावरणीय कारणों से प्रभावित होता है।

बार-बार मोबाइल चेक करना क्यों हो सकता है संकेत?

क्या आपने कभी फोन अपनी जेब या टेबल पर रखा और कुछ मिनट बाद बिना किसी खास वजह के उसे फिर उठा लिया?

कई लोगों में यह व्यवहार इतनी आसानी से दोहराया जाता है कि उन्हें इसका एहसास भी नहीं होता। नोटिफिकेशन न आने के बावजूद स्क्रीन देखना, सोशल मीडिया ऐप खोलना या फोन को बार-बार अनलॉक करना धीरे-धीरे आदत बन सकता है।

अगर फोन पास न होने पर बेचैनी महसूस होने लगे या कुछ समय बिना फोन के बिताना मुश्किल लगे, तो अपने स्क्रीन इस्तेमाल पर ध्यान देना जरूरी है।

यहां सवाल केवल यह नहीं है कि दिन में कितने घंटे फोन चलाया जा रहा है। असली सवाल यह है कि क्या मोबाइल आपकी दिनचर्या को नियंत्रित कर रहा है?

सोशल मीडिया के बाद उदासी और तुलना भी चेतावनी

सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली जिंदगी वास्तविक जिंदगी का पूरा चित्र नहीं होती। लोग आमतौर पर अपनी जिंदगी के अच्छे पल, सफलताएं, यात्राएं और खुशियों से जुड़े क्षण ज्यादा साझा करते हैं।

ऐसे में लगातार दूसरों की उपलब्धियां देखने से व्यक्ति अपने जीवन की तुलना उनसे करने लगता है।

किसी को लगता है कि दूसरे लोग उससे ज्यादा सफल हैं। किसी को अपनी आर्थिक स्थिति कमतर लगने लगती है। कोई अपनी शक्ल या शरीर से असंतुष्ट महसूस कर सकता है।

अगर सोशल मीडिया इस्तेमाल करने के बाद बार-बार उदासी, तनाव, ईर्ष्या या अपनी जिंदगी को लेकर नकारात्मक सोच महसूस हो, तो इस व्यवहार पर ध्यान देना जरूरी है।

याद रखें—सोशल मीडिया पर दिखने वाली कुछ तस्वीरें किसी व्यक्ति की पूरी जिंदगी नहीं होतीं।

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